Hindi

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ഇന്ദുലേഖ

O. Chandu Menon · 1889 · हिन्दी

BETAKerala's first major Malayalam novel, here in 28 languages. AI-assisted translation from the proofed Malayalam source; human-reviewed for some languages, beta for others. Found an error? editor@insightpublica.com

प्रथम अध्याय प्रारम्भ

चात्तर मेनवन: माधवन, तुमने इतनी साहसपूर्वक बात क्यों कही? छिः! यह तनिक भी उचित नहीं हुआ। उन्हें जो उचित लगे, वे करें। हमें कारणवर (संयुक्त घराने के वरिष्ठ पुरुष मुखिया) के अधीन रहना चाहिये न? तुम्हारी बात कुछ सीमा लाँघ गयी। माधवन: तनिक भी नहीं लाँघी है। किसी को भी हठ नहीं दिखानी चाहिये। यदि उनकी इच्छा नहीं है, तो न करें। शिण्णन को मैं अपने साथ ले जा रहा हूँ। मैं उसे पढ़ाऊँगा। कुम्मिणी अम्मा: नहीं बेटा, वह मुझसे दूर नहीं रह पाएगा। तुम चात्तर या गोपालन को ले जाकर पढ़ा लो। जो भी हो, कारणवर तुमसे अप्रसन्न हो गये हैं। हमसे तो वे पहले से ही अप्रसन्न हैं, किन्तु अब तक तुम्हें वे बहुत मानते थे। माधवन: ठीक है, अब चात्तर ज्येष्ठ और गोपालन को अंग्रेज़ी पढ़ाने ले जाना तो विचित्र ही होगा।

जब वे इस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे, तभी एक सेवक ने आकर कहा कि माधवन को उनके मामा शंकर मेनवन बुला रहे हैं। तत्काल माधवन अपने मामा के कक्ष में चला गया।

इससे पूर्व कि यह कथा आगे बढ़े, यहाँ माधवन की स्थिति के विषय में कुछ कहना आवश्यक हो गया है। माधवन की आयु, पंचु मेनवन के साथ उसके सम्बन्धम् (नायर-नम्बूतिरि के विशिष्ट वैवाहिक सम्बन्ध) का विवरण, तथा उसकी उत्तीर्ण परीक्षाओं का विवरण, इन सब विषयों का उल्लेख प्रस्तावना में किया जा चुका है। अब उसके विषय में जो कहना है, उसे संक्षेप में कहता हूँ।

माधवन एक अति बुद्धिमान एवं अति सुदर्शन युवक है। उसके बुद्धि-कौशल की विशेषता को, अंग्रेज़ी की शिक्षा आरम्भ करने से लेकर बी. एल. उत्तीर्ण करने तक, विद्यालय में उसे जो प्रशंसनीय एवं क्रमबद्ध कीर्ति प्राप्त हुई थी, उसी ने स्पष्ट एवं पूर्ण रूप से प्रकट कर दिया था। ऐसी कोई परीक्षा नहीं थी, जिसमें माधवन प्रथम प्रयास में ही उत्तीर्ण न हुआ हो। एफ. ए. तथा बी. ए., दोनों ही उसने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। बी. ए. की परीक्षा में उसकी अन्य भाषा संस्कृत थी। संस्कृत में माधवन को उत्तम व्युत्पत्ति प्राप्त थी। बी. एल. में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान पाने के कारण माधवन को अनेक पुरस्कार भी मिले थे। विद्यालय में माधवन को पढ़ाने वाले सभी गुरुजनों को यह विश्वास था कि उनके शिष्यों में माधवन से अधिक सामर्थ्य और योग्यता वाला कोई भी कभी नहीं रहा। उसे देखकर परिचित होने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यही प्रतीत होता कि मानो इस विशेष बुद्धि के निवास के लिए ही तदनुरूप माधवन की देह की रचना की गयी थी।

किसी पुरुष के गुण-दोषों का वर्णन करते समय उसके शारीरिक सौन्दर्य का विशेष रूप से वर्णन करना प्रायः अनावश्यक होता है। बुद्धि, सामर्थ्य, शिक्षा, पौरुष, विनय आदि गुणों के विषय में कहना ही पर्याप्त होता है। तथापि, माधवन की देह-कान्ति के विषय में यहाँ दो शब्द कहे बिना रहना इस कथा की अवस्था के लिए अपर्याप्त होगा, ऐसी मेरे पाठकगण कदाचित सम्मति देंगे, इस आशंका से मैं संक्षेप में कहता हूँ।

उसकी देह का वर्ण स्वर्णिम था। प्रतिदिन शरीर के स्वास्थ्य हेतु किये जाने वाले व्यायामों के कारण इस यौवनकाल में माधवन का शरीर अति मनोहर था। आवश्यकता से अधिक तनिक भी स्थूल हुए बिना, और तनिक भी कृशता प्रतीत हुए बिना, माधवन के हाथ, वक्ष और पैर देखने में ऐसे लगते थे मानो स्वर्ण से ढालकर रखे गये हों। उसका कद पर्याप्त ऊँचा था। यदि माधवन की देह को मापना हो, तो उसके घुटनों तक लम्बी और अत्यन्त सुन्दर शिखा से, बिना किसी कठिनाई के, घुटनों तक सटीक रूप से मापा जा सकता था। माधवन के मुख की कान्ति और पौरुष-श्री, प्रत्येक अंग का अपना-अपना विशेष सौन्दर्य और उनका पारस्परिक सामंजस्य, और कुल मिलाकर माधवन के मुख और शरीर का स्वभाव देखने पर जो शोभा दिखती थी, उसे आश्चर्यजनक ही कहा जा सकता है। माधवन से परिचित सभी यूरोपीय केवल उसे देखने मात्र से ही उस पर अत्यधिक मुग्ध हो जाते और उसके प्रिय बन जाते थे।

इस प्रकार, इस यौवनारम्भ में उसका शरीर और कीर्ति दोनों ही अति मनोहर हैं, यह सर्वजनों की सम्मति उसके लिए एक बड़ा भूषण थी - इसे कभी नष्ट नहीं करना चाहिये, इस विचार से, अथवा स्वाभाविक बुद्धि-गुण के कारण, यह तो ज्ञात नहीं, किन्तु माधवन सामान्य युवकों में अठारह वर्ष की आयु से लेकर क्रमशः विवाह कर गृहस्थाश्रमी होने के बीच दुर्भाग्यवश कभी-कभी देखे जाने वाले किसी भी दुर्व्यसन में तनिक भी लिप्त नहीं हुआ था, यह मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ। इस कारण, उसकी स्वाभाविक देह-कान्ति, फुर्ती और पौरुष पूर्ण यौवन आने पर देखने योग्य ही थे।

माधवन को अंग्रेज़ी में अत्यधिक नैपुण्य प्राप्त था, यह तो अब मुझे कहने की आवश्यकता नहीं। लॉन टेनिस, क्रिकेट आदि अंग्रेज़ी शैली के व्यायाम-मनोरंजनों में भी माधवन अति निपुण था। आखेट में वह बाल्यावस्था से ही परिश्रम करता आया था। सम्भवतः यह उसे अपने पिता गोविन्दप्पणिक्कर से प्राप्त एक संस्कार था - वे आखेट के बड़े व्यसनी थे। आखेट में माधवन की आसक्ति बहुत प्रबल थी। दो-तीन प्रकार की विशेष बन्दूकें, दो-तीन पिस्तौल और रिवाल्वर वह जहाँ भी जाता, अपने साथ रखता था। जब तक कि उसके मनोरंजन के सुख अन्ततः एक अन्य मार्ग की ओर नहीं मुड़ गये, माधवन ने अपना अधिकतर मनोरंजन आखेट में ही किया था।

सेवक के आकर बुलाने पर माधवन अपने मामा के पास जाकर खड़ा हो गया।

शंकर मेनवन: माधवन, यह क्या कहानी है! वृद्धावस्था में तुमने कारणवर से कैसे अपमानजनक शब्द कहे! उन्होंने तुम्हें अंग्रेज़ी पढ़ाई, क्या यह उसी का फल है? तुम्हारे लिए उन्होंने कितना द्रव्य व्यय किया है! माधवन: मामाजी भी ऐसा ही विचार रखते हैं, यह हमारा दुर्भाग्य है! जब बात न्याय की हो, तो मैं अन्यायपूर्वक किसी से डरकर चुप नहीं रहूँगा। मुझसे इस प्रकार की दुष्टता देखी नहीं जाती। बड़े मामा ने शारीरिक श्रम से जो एक पैसा भी कमाया है, उसे व्यय करने के लिए मैंने नहीं कहा है। पूर्वजों द्वारा अर्जित और हमारी उन्नति और हित के लिए जो धन उन्होंने अपने अधिकार में रखा है, उसे हमारी न्यायपूर्ण आवश्यकताओं के लिए ही व्यय करने को मैंने कहा है। कुम्मिणी अम्मा और उनकी सन्तानें यहाँ की भृत्य नहीं हैं, बड़े मामा ने उन्हें इतनी निर्दयता से क्यों त्याग दिया है? उनके दो बेटों को अंग्रेज़ी नहीं पढ़ाई - कल्याणिकुट्टि को भी ठीक से कुछ नहीं पढ़ाया। यह कैसा अन्याय कर रहे हैं वे! क्या ऐसी दुष्टता की जा सकती है? अब उस छोटे शिण्णन को भी एक साँड की भाँति पालने का विचार है। मैं इसकी अनुमति नहीं दूँगा। मैं उसे ले जाकर पढ़ाऊँगा। शंकर मेनवन: शाबाश! शाबाश! बहुत उत्तम! तुम किस धन से पढ़ाओगे? तुम्हें तो महीने में पचास रुपये ही मिलते हैं न? तुम कैसे पढ़ाओगे? मामा की अप्रसन्नता होने पर अनेक कठिनाइयाँ आ सकती हैं। तुरन्त जाकर उनके चरणों में गिर पड़ो।

"मामा की अप्रसन्नता से अनेक कठिनाइयाँ आएँगी," यह सुनते ही माधवन ने सबसे पहले इन्दुलेखा के विषय में सोचा। यह विचार आते ही माधवन के मुख पर एक स्पष्ट भाव-परिवर्तन हुआ। किन्तु उसने उसे क्षण भर में ही दबा लिया। कक्ष में इधर-उधर टहलते हुए, हल्के से मन्दहास के साथ माधवन ने उत्तर दिया। माधवन: मैं उन्हें क्यों अप्रसन्न कर रहा हूँ? न्यायपूर्ण बात कहने पर वे क्यों अप्रसन्न होंगे? उनकी उस अन्यायपूर्ण अप्रसन्नता से मुझे कोई भय नहीं है। शंकर मेनवन: छिः! गुरुजनों का अनादर मत करो। माधवन: कैसा अनादर? मैं तो इस शब्द का अर्थ ही नहीं जानता। शंकर मेनवन: यही न जानना तो कठिनाई है। अप्पू! तुमने थोड़ी अंग्रेज़ी पढ़कर स्वयं को चतुर समझ लिया है, यह सोचकर हमारे रीति-रिवाज और परम्पराओं को मत त्यागो। बेटा, भोजन हो गया क्या? माधवन: नहीं। मेरे मन को बहुत कष्ट हुआ।

माँ दूध की काँजी लेकर पीछे-पीछे आ रही थीं। तभी पार्वती अम्मा चाँदी के कटोरे में दूध की काँजी लिए हुए भीतर प्रविष्ट हुईं।

शंकर मेनवन: पार्वती! सुना तुमने, बेटे ने जो कुछ कहा? पार्वती अम्मा: सुना! तनिक भी अच्छा नहीं किया। माधवन: काँजी इधर दीजिये। खड़े-खड़े ही दो घूँट काँजी पीकर, माँ के मुख की ओर देखकर मुस्कुराते हुए। माधवन: क्या, माँ भी मुझसे रुष्ट हो गयीं? पार्वती अम्मा: और नहीं तो क्या; इसमें क्या सन्देह है? जो ज्येष्ठ और मामा को प्रिय नहीं, वह मुझे भी प्रिय नहीं। अच्छा; यह काँजी पी लो। फिर बात करते हैं। दोपहर हो गयी है। अपनी शिखा को हर समय ऐसे लटकाये क्यों रखते हो; इधर आओ; मैं बाँध देती हूँ। शिखा आधी खुल गयी है। माधवन: माँ, शिण्णन को अंग्रेज़ी पढ़ाना आवश्यक है या नहीं? आप ही कहिये। पार्वती अम्मा: बेटा, यह तो तुम्हारे बड़े मामा को निश्चय करना है न। मैं क्या जानूँ। तुम्हें बड़े मामा ने ही तो पढ़ाया है? वे ही उसे भी पढ़ा देंगे। माधवन: और यदि बड़े मामा न पढ़ाएँ तो? पार्वती अम्मा: तो पढ़ने की आवश्यकता नहीं। माधवन: इसकी मैं अनुमति नहीं दूँगा। पार्वती अम्मा: कटोरा इधर दो; मैं जाती हूँ। भोजन के लिए शीघ्र आना।

മലയാളം
हिन्दी
ഒന്നാം അദ്ധ്യായം പ്രാരംഭം
प्रथम अध्याय प्रारम्भ
ചാത്തരമേനവൻ / Chathara Menon
എന്താണു മാധവാ ഇങ്ങനെ സാഹസമായി വാക്കുപറഞ്ഞത്? ഛീ ഒട്ടും നന്നായില്ല. അദ്ദേഹത്തിൻ്റെ മനസ്സുപോലെ ചെയ്യട്ടെ. കാരണവന്മാർക്കു നോം കീഴടങ്ങണ്ടേ? നിന്റെ വാക്കു കൂറേ കവിഞ്ഞുപോയി.
माधवन, तुमने इतनी साहसपूर्वक बात क्यों कही? छिः! यह तनिक भी उचित नहीं हुआ। उन्हें जो उचित लगे, वे करें। हमें कारणवर (संयुक्त घराने के वरिष्ठ पुरुष मुखिया) के अधीन रहना चाहिये न? तुम्हारी बात कुछ सीमा लाँघ गयी।
മാധവൻ / Madhavan
അശേഷം കവിഞ്ഞിട്ടില്ലാ. സിദ്ധാന്തം ആരും കാണിക്കരുത്. അദ്ദേഹത്തിന് മനസ്സില്ലെങ്കിൽ ചെയ്യേണ്ട. ശിന്നനെ ഞാൻ ഒന്നിച്ചു കൊണ്ടു പോവുന്നു. അവനെ ഞാൻ പഠിപ്പിക്കും.
तनिक भी नहीं लाँघी है। किसी को भी हठ नहीं दिखानी चाहिये। यदि उनकी इच्छा नहीं है, तो न करें। शिण्णन को मैं अपने साथ ले जा रहा हूँ। मैं उसे पढ़ाऊँगा।
കുമ്മിണി അമ്മ / Kummini Amma
വേണ്ടാ കുട്ടാ, അവൻ എന്നെ പിരിഞ്ഞു പാർക്കാൻ ആയില്ലാ, നീചാത്തരെയോ, ഗോപാലനെയോ കൊണ്ടുപോയി പഠിപ്പിച്ചൊ. ഏതായാലും നിന്നോടു കാരണവർക്കു മുഷിഞ്ഞു. ഞങ്ങളോടു മുമ്പുതന്നെ മുഷിഞ്ഞിട്ടാണെങ്കിലും നിന്നെ ഇതുവരെ അദ്ദേഹത്തിനു വളരെ താല്പര്യമായിരുന്നു.
नहीं बेटा, वह मुझसे दूर नहीं रह पाएगा। तुम चात्तर या गोपालन को ले जाकर पढ़ा लो। जो भी हो, कारणवर तुमसे अप्रसन्न हो गये हैं। हमसे तो वे पहले से ही अप्रसन्न हैं, किन्तु अब तक तुम्हें वे बहुत मानते थे।
മാധവൻ / Madhavan
ശരി, ചാത്തരജേഷ്ടനെയും ഗോപാലനെയും എനി ഇംക്ലീഷ് പഠിപ്പിക്കാൻ കൊണ്ടുപോയാൽ വിചിത്രം തന്നെ. ഇങ്ങനെ ഇവർ സംസാരിച്ചുകൊണ്ടു നില്ക്കുന്ന മദ്ധ്യേ ഒരു ഭൃത്യൻ വന്നു മാധവനെ അമ്മാമൻ ശങ്കരമേനവൻ വിളിക്കുന്നു എന്നു പറഞ്ഞു. ഉടനെ മാധവൻ അമ്മാമൻ്റെ മുറിയിലേക്കു പോയി. ഈ കഥ എനിയും പരക്കുന്നതിനു മുമ്പ് മാധവൻ്റെ അവസ്ഥയെക്കുറിച്ചു സ്വല്പമായി ഇവിടെ പ്രസ്താവിക്കേണ്ടി വന്നിരിക്കുന്നു. മാധവന്റെ വയസ്സ്, പഞ്ചുമേനവനുമായുള്ള സംബന്ധവിവരം, പാസ്സായ പരീക്ഷകളുടെ വിവരം ഇതുകളെപ്പറ്റി പീഠികയിൽ പറഞ്ഞിട്ടുണ്ടല്ലോ. എനി ഇയ്യാളെക്കുറിച്ചു പറവാനുള്ളതു ചുരുക്കത്തിൽ പറയാം. മാധവൻ അതിബുദ്ധിമാനും അതികോമളനും ആയ ഒരു യുവാവാകുന്നു. ഇയാളുടെ ബുദ്ധിസാമർത്ഥ്യത്തിൻ്റെ വിശേഷതയെ, ഇംഗ്ലീഷ് പഠിപ്പു തുടങ്ങിയതുമുതൽ ബി എൽ പാസ്സാവുന്നതുവരെ സ്കൂളിൽ അയാൾക്കു ശ്ലാഘനീയമായി ക്രമോൽകർഷമായി വന്നു ചേർന്ന കീർത്തിതന്നെ സ്പഷ്ടമായും പൂർത്തിയായും വെളിവാക്കിയിരുന്നു. ഒരു പരീക്ഷയിലെങ്കിലും മാധവൻ ഒന്നാമതു പോ യ പ്രാവശ്യം ജയിക്കാതിരുന്നിട്ടില്ലാ. എഫ്. എ. ബി.എ ഇതുകൾ രണ്ടും ഒന്നാം ക്ലാസ്സായിട്ടു ജയിച്ചു. ബി. എ പരീക്ഷക്ക് അന്യഭാഷ സംസ്കൃതമായിരുന്നു. സംസ്കൃതത്തിൽ മാധവന് ഒന്നാന്തരം വില്പത്തി ഉണ്ടായി. ബി. എൽ. ഒന്നാം ക്ലാസ്സിൽ ഒന്നാമനായി ജയിച്ചതിനാൽ മാധവനു പലേ സമ്മാനങ്ങളും കിട്ടീട്ടു ണ്ടായിരുന്നു. സ്കൂളിൽ മാധവനെ പഠിപ്പിച്ച എല്ലാ ഗുരുനാഥന്മാർക്കും, മാധവനെക്കാൾ സാമർത്ഥ്യവും യോഗ്യതയും ഉണ്ടായിട്ട് അവരുടെ ശിഷ്യന്മാരിൽ ഒരുവനും ഒരിക്കലും ഉണ്ടായിട്ടില്ലെന്നുള്ള ബോദ്ധ്യമാണ് ഉണ്ടായിരുന്നത്. ഈ വിശേഷവിധിയായ ബുദ്ധിക്കു പാർപ്പിടമായിരിപ്പാൻ തദനുരൂപമായി സൃഷ്ടിച്ചതോ മാധവന്റെ ദേഹം എന്ന് അയാളെ കണ്ടു പരിചയമായ ഏവനും തോന്നും. ഒരു പുരുഷൻ്റെ ഗുണദോഷങ്ങളെ വിവരിക്കുന്നതിൽ അവന്റെ ശരീര സൗന്ദര്യവർണ്ണന വിശേഷവിധിയായി ചെയ്യുന്നതു സാധാരണ അനാവശ്യമാകുന്നു. ബുദ്ധി, സാമർത്ഥ്യം, പഠിപ്പ്, പൗരുഷം, വിനയാദിഗുണങ്ങൾ ഇതുകളെപ്പറ്റി പറഞ്ഞാൽ മതിയാവുന്നതാണ്. എന്നാലും മാധവൻ്റെ ദേഹകാന്തിയെപ്പറ്റി രണ്ടക്ഷരം ഇവിടെ പറയാതിരിക്കുന്നത് ഈ കഥയുടെ അവസ്ഥയ്ക്ക് മതിയായില്ലെന്ന് ഒരു സമയം എൻ്റെ വായനക്കാർ അഭിപ്രായപ്പെടുമോ എന്നു ഞാൻ ശങ്കിക്കുന്നതിനാൽ ചുരുക്കി പറയുന്നു. ദേഹം തങ്ക വർണ്ണം, ദിനംപ്രതി ശരീരത്തിൻ്റെ ഗുണത്തിനുവേണ്ടി ആചരിച്ചുവന്ന വ്യായാമങ്ങളാൽ ഈ യൗവനകാലത്ത് മാധവൻ്റെ ദേഹം അതിമോഹനമായിരുന്നു. വേണ്ടതിലധികം അശേഷം തടിക്കാതെയും അശേഷം മെലിവു തോന്നാതെയും കാണപ്പെടുന്ന മാധവൻ്റെ കൈകൾ, മാറിടം, കാലുകൾ കാഴ്ചയിൽ സ്വർണ്ണംകൊണ്ടു വാർത്തുവെച്ചതോ എന്നു തോന്നാം. ആൾദീർഘം ധാരാളം ഉണ്ട്. മാധവൻ്റെ ദേഹം അളന്നു നോക്കേണമെങ്കിൽ പ്രയാസമില്ലാതെ കാലുകളുടെ മുട്ടിനുസമം നീളമുള്ളതും അതിഭംഗിയുള്ളതും ആയ മാധവന്റെ കുടുമകൊണ്ടു മുട്ടോളം കൃത്യമായി അളക്കാം. മാധവൻ്റെ മുഖത്തിന് കാന്തിയും പൗരുഷശ്രീയും ഓരോ അവയവങ്ങൾക്കു പ്രത്യേകം പ്രത്യേകം ഉള്ള ഒരു സൗന്ദര്യവും അന്യോന്യമുള്ള യോജ്യതയും ആകപ്പാടെ മാധവൻ്റെ മുഖവും ദേഹസ്വഭാവവും കൂടി കാണുമ്പോൾ ഉള്ള ഒരു ശോഭയും അദ്ഭുതപ്പെടത്തക്കതെന്നേ പറവാനുള്ളൂ. മാധവനെ പരിചയമുള്ള സകല യൂറോപ്യന്മാരും വെറും കാഴ്ചയിൽ തന്നെ മാധവനെ അതികൗതുകം തോന്നി മാധവൻ്റെ ഇഷ്ടന്മാരായിത്തീർന്നു. ഇങ്ങനെ ഈ യൗവനാരംഭത്തിൽ തൻ്റെ ശരീരവും കീർത്തിയും അതിമനോഹരമാണെന്നു സർവ്വജനങ്ങൾക്കും അഭിപ്രായം ഉള്ളതു തനിക്കു വലിയ ഒരു ഭൂഷണമാണ് - അത് ഒരിക്കലും ഇല്ലായ്മ ചെയ്യരുതെന്നുള്ള വിചാരംകൊണ്ടോ, അതല്ല സ്വഭാവികമായ ബുദ്ധിഗുണം കൊണ്ടോ എന്നറിഞ്ഞില്ല, മാധവൻ സാധാരണ യുവാക്കളിൽ ഒരു പതിനെട്ടുവയസ്സുമുതൽ ക്രമമായി കല്യാണം ചെയ്തു ഗൃഹസ്ഥാശ്രമികളാവുന്നതിനിടയിൽ നിർഭാഗ്യവശാൽ ചിലപ്പോൾ കാണപ്പെടുന്ന ദുർവ്യാപാരങ്ങളിൽ ഒന്നും അശേഷം പ്രവേശിച്ചിട്ടില്ലെന്ന് എനിക്ക് ഉറ പ്പായി പറയാം. അതുകൊണ്ട് സ്വഭാവേനയുള്ള ദേഹകാന്തിയും മിടുക്കും പൗരുഷവും മാധവനു പൂർണ്ണ യൗവനമായപ്പോൾ കാണേണ്ടതുതന്നെയായിരുന്നു. മാധവന് ഇംക്ലീഷിൽ അതിനൈപുണ്യമായിരുന്നുവെന്ന് ഞാൻ എനി പറയേണ്ടതില്ലല്ലോ. ലൊൻ ടെനിസ്സ്, കൃക്കറ്റ് മുതലായ ഇംക്ലീഷുമാതിരി വ്യായാമവിനോദങ്ങളിലും മാധവൻ അതിനിപുണനായിരുന്നു. നായാട്ടിൽ ചെറുപ്പം മുതല്ക്കേ പരിശ്രമിച്ചിരുന്നു. പക്ഷേ, ഇതു തന്റെ അച്ഛൻ ഗോവിന്ദപ്പണിക്കരിൽ നിന്നു കിട്ടിയ ഒരു വാസനയായിരിക്കാം - അദ്ദേഹം വലിയ നായാട്ടുഭ്രാന്തനായിരുന്നു. നായാട്ടിൽ ഉള്ള ആസക്തി മാധവനു വളരെ കലശലായിരുന്നു രണ്ടുമൂന്നുവിധം വിശേഷമായ തോക്കുകൾ, രണ്ടുമൂന്നു പിസ്റ്റോൾ, റിവോൾവർ ഇതുകൾ താൻ പോവുന്നേടത്ത് എല്ലാം കൊണ്ടു നടക്കാറാണ്. തൻറെ വിനോദസുഖങ്ങൾ ഒടുവിൽ വേറെ ഒരു വഴിയിൽ തിരിഞ്ഞതുവരെ ശിക്കാറിൽ തന്നെയാണ് അധികവും മാധവൻ വിനോദിച്ചിരുന്നത്. ഭൃത്യൻ വന്നു വിളിച്ചതിനാൽ മാധവൻ തന്റെ അമ്മാമന്റെ അടുക്കെ ചെന്നു നിന്നു.
ठीक है, अब चात्तर ज्येष्ठ और गोपालन को अंग्रेज़ी पढ़ाने ले जाना तो विचित्र ही होगा। जब वे इस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे, तभी एक सेवक ने आकर कहा कि माधवन को उनके मामा शंकर मेनवन बुला रहे हैं। तत्काल माधवन अपने मामा के कक्ष में चला गया। इससे पूर्व कि यह कथा आगे बढ़े, यहाँ माधवन की स्थिति के विषय में कुछ कहना आवश्यक हो गया है। माधवन की आयु, पंचु मेनवन के साथ उसके सम्बन्धम् (नायर-नम्बूतिरि के विशिष्ट वैवाहिक सम्बन्ध) का विवरण, तथा उसकी उत्तीर्ण परीक्षाओं का विवरण, इन सब विषयों का उल्लेख प्रस्तावना में किया जा चुका है। अब उसके विषय में जो कहना है, उसे संक्षेप में कहता हूँ। माधवन एक अति बुद्धिमान एवं अति सुदर्शन युवक है। उसके बुद्धि-कौशल की विशेषता को, अंग्रेज़ी की शिक्षा आरम्भ करने से लेकर बी. एल. उत्तीर्ण करने तक, विद्यालय में उसे जो प्रशंसनीय एवं क्रमबद्ध कीर्ति प्राप्त हुई थी, उसी ने स्पष्ट एवं पूर्ण रूप से प्रकट कर दिया था। ऐसी कोई परीक्षा नहीं थी, जिसमें माधवन प्रथम प्रयास में ही उत्तीर्ण न हुआ हो। एफ. ए. तथा बी. ए., दोनों ही उसने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। बी. ए. की परीक्षा में उसकी अन्य भाषा संस्कृत थी। संस्कृत में माधवन को उत्तम व्युत्पत्ति प्राप्त थी। बी. एल. में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान पाने के कारण माधवन को अनेक पुरस्कार भी मिले थे। विद्यालय में माधवन को पढ़ाने वाले सभी गुरुजनों को यह विश्वास था कि उनके शिष्यों में माधवन से अधिक सामर्थ्य और योग्यता वाला कोई भी कभी नहीं रहा। उसे देखकर परिचित होने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यही प्रतीत होता कि मानो इस विशेष बुद्धि के निवास के लिए ही तदनुरूप माधवन की देह की रचना की गयी थी। किसी पुरुष के गुण-दोषों का वर्णन करते समय उसके शारीरिक सौन्दर्य का विशेष रूप से वर्णन करना प्रायः अनावश्यक होता है। बुद्धि, सामर्थ्य, शिक्षा, पौरुष, विनय आदि गुणों के विषय में कहना ही पर्याप्त होता है। तथापि, माधवन की देह-कान्ति के विषय में यहाँ दो शब्द कहे बिना रहना इस कथा की अवस्था के लिए अपर्याप्त होगा, ऐसी मेरे पाठकगण कदाचित सम्मति देंगे, इस आशंका से मैं संक्षेप में कहता हूँ। उसकी देह का वर्ण स्वर्णिम था। प्रतिदिन शरीर के स्वास्थ्य हेतु किये जाने वाले व्यायामों के कारण इस यौवनकाल में माधवन का शरीर अति मनोहर था। आवश्यकता से अधिक तनिक भी स्थूल हुए बिना, और तनिक भी कृशता प्रतीत हुए बिना, माधवन के हाथ, वक्ष और पैर देखने में ऐसे लगते थे मानो स्वर्ण से ढालकर रखे गये हों। उसका कद पर्याप्त ऊँचा था। यदि माधवन की देह को मापना हो, तो उसके घुटनों तक लम्बी और अत्यन्त सुन्दर शिखा से, बिना किसी कठिनाई के, घुटनों तक सटीक रूप से मापा जा सकता था। माधवन के मुख की कान्ति और पौरुष-श्री, प्रत्येक अंग का अपना-अपना विशेष सौन्दर्य और उनका पारस्परिक सामंजस्य, और कुल मिलाकर माधवन के मुख और शरीर का स्वभाव देखने पर जो शोभा दिखती थी, उसे आश्चर्यजनक ही कहा जा सकता है। माधवन से परिचित सभी यूरोपीय केवल उसे देखने मात्र से ही उस पर अत्यधिक मुग्ध हो जाते और उसके प्रिय बन जाते थे। इस प्रकार, इस यौवनारम्भ में उसका शरीर और कीर्ति दोनों ही अति मनोहर हैं, यह सर्वजनों की सम्मति उसके लिए एक बड़ा भूषण थी - इसे कभी नष्ट नहीं करना चाहिये, इस विचार से, अथवा स्वाभाविक बुद्धि-गुण के कारण, यह तो ज्ञात नहीं, किन्तु माधवन सामान्य युवकों में अठारह वर्ष की आयु से लेकर क्रमशः विवाह कर गृहस्थाश्रमी होने के बीच दुर्भाग्यवश कभी-कभी देखे जाने वाले किसी भी दुर्व्यसन में तनिक भी लिप्त नहीं हुआ था, यह मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ। इस कारण, उसकी स्वाभाविक देह-कान्ति, फुर्ती और पौरुष पूर्ण यौवन आने पर देखने योग्य ही थे। माधवन को अंग्रेज़ी में अत्यधिक नैपुण्य प्राप्त था, यह तो अब मुझे कहने की आवश्यकता नहीं। लॉन टेनिस, क्रिकेट आदि अंग्रेज़ी शैली के व्यायाम-मनोरंजनों में भी माधवन अति निपुण था। आखेट में वह बाल्यावस्था से ही परिश्रम करता आया था। सम्भवतः यह उसे अपने पिता गोविन्दप्पणिक्कर से प्राप्त एक संस्कार था - वे आखेट के बड़े व्यसनी थे। आखेट में माधवन की आसक्ति बहुत प्रबल थी। दो-तीन प्रकार की विशेष बन्दूकें, दो-तीन पिस्तौल और रिवाल्वर वह जहाँ भी जाता, अपने साथ रखता था। जब तक कि उसके मनोरंजन के सुख अन्ततः एक अन्य मार्ग की ओर नहीं मुड़ गये, माधवन ने अपना अधिकतर मनोरंजन आखेट में ही किया था। सेवक के आकर बुलाने पर माधवन अपने मामा के पास जाकर खड़ा हो गया।
ശങ്കരമേനവൻ / Sankara Menon
മാധവാ, ഇത് എന്തു കഥയാണ്! വയസ്സുകാലത്തു കാരണവരോട് എന്തെല്ലാം അധിക്ഷേപമായ വാക്കുകളാണ് നീ പറഞ്ഞത്. അദ്ദേഹം നിന്നെ ഇംഗ്ലീഷ് പഠിപ്പിച്ചതിൻ്റെ ഫലമോ ഇത്? എത്ര ദ്രവ്യം നിണക്കുവേണ്ടി അദ്ദേഹം ചിലവു ചെയ്തു.
माधवन, यह क्या कहानी है! वृद्धावस्था में तुमने कारणवर से कैसे अपमानजनक शब्द कहे! उन्होंने तुम्हें अंग्रेज़ी पढ़ाई, क्या यह उसी का फल है? तुम्हारे लिए उन्होंने कितना द्रव्य व्यय किया है!
മാധവൻ / Madhavan
അമ്മാമനും ഇങ്ങനെ അഭിപ്രായപ്പെടുന്നതു ഞങ്ങളുടെ നിർഭാഗ്യം! കാര്യം പറയുമ്പോൾ ഞാൻ അന്യായമായി ആരേയും ഭയപ്പെട്ടു പറയാതിരിക്കില്ല. എനിക്ക് ഈ വക ദുഷ്ടതകൾ കണ്ടുകൂടാ. വലിയമ്മാമൻ ദേഹാദ്ധ്വാനം ചെയ്തു സമ്പാദിച്ചതായ ഒരു ക ാശുപോലും ചിലവിടാൻ ഞാൻ ആവശ്യപ്പെട്ടിട്ടില്ല. പൂർവ്വന്മാർ സമ്പാദിച്ചതും നമ്മുടെ അഭ്യുദയത്തിനും ഗുണത്തിനും വേണ്ടി അദ്ദേഹം കൈവശം വെച്ചിരിക്കുന്നതുമായ പണം നമ്മളുടെ ന്യായമായ ആവശ്യങ്ങൾക്കുവേണ്ടി ചെലവിടാനെ ഞാൻ പറഞ്ഞുള്ളൂ. കുമ്മിണിഅമ്മയും അവരുടെ സന്താനങ്ങളും ഇവിടുത്തെ ഭ്യത്യന്മാരല്ല, അവരെ എന്താണു വലിയമ്മാമൻ ഇത്ര നിർദ്ദയമായി തള്ളിക്കളഞ്ഞിരിക്കുന്നത്? അവരുടെ രണ്ടു മക്കളെ ഇംക്ലീഷു പഠിപ്പിച്ചില്ല - കല്യാണിക്കുട്ടിയേയും വേണ്ടും പോലെ ഒന്നും പഠിപ്പിച്ചില്ല. എന്തുകഷ്ടമാണ് ഇദ്ദേഹം ചെയ്യുന്നത്. ഇങ്ങനെ ദുഷ്ടതകാട്ടാമോ? എനി ആ ചെറിയ ശിന്നനെയും മൂരിക്കുട്ടനെപ്പോലെ വളർത്താനാണത്രേ ഭാവം. ഇ തിനു ഞാൻ സമ്മതിക്കയില്ല. ഞാൻ അവനെ കൊണ്ടുപോയി പഠിപ്പിക്കും.
मामाजी भी ऐसा ही विचार रखते हैं, यह हमारा दुर्भाग्य है! जब बात न्याय की हो, तो मैं अन्यायपूर्वक किसी से डरकर चुप नहीं रहूँगा। मुझसे इस प्रकार की दुष्टता देखी नहीं जाती। बड़े मामा ने शारीरिक श्रम से जो एक पैसा भी कमाया है, उसे व्यय करने के लिए मैंने नहीं कहा है। पूर्वजों द्वारा अर्जित और हमारी उन्नति और हित के लिए जो धन उन्होंने अपने अधिकार में रखा है, उसे हमारी न्यायपूर्ण आवश्यकताओं के लिए ही व्यय करने को मैंने कहा है। कुम्मिणी अम्मा और उनकी सन्तानें यहाँ की भृत्य नहीं हैं, बड़े मामा ने उन्हें इतनी निर्दयता से क्यों त्याग दिया है? उनके दो बेटों को अंग्रेज़ी नहीं पढ़ाई - कल्याणिकुट्टि को भी ठीक से कुछ नहीं पढ़ाया। यह कैसा अन्याय कर रहे हैं वे! क्या ऐसी दुष्टता की जा सकती है? अब उस छोटे शिण्णन को भी एक साँड की भाँति पालने का विचार है। मैं इसकी अनुमति नहीं दूँगा। मैं उसे ले जाकर पढ़ाऊँगा।
ശങ്കരമേനവൻ / Sankara Menon
ശിക്ഷ - ശിക്ഷ! വിശേഷം തന്നെ! നീ എന്തുകൊണ്ടാണ് പഠിപ്പിക്കുന്നത്? മാസത്തിൽ അമ്പത് ഉറുപ്പികല്ലേ നിണക്കു തരുന്നുള്ളൂ? നീ എന്തുകൊണ്ടു പഠിപ്പിക്കും? അമ്മാമൻ്റെ മുഷിച്ചൽ ഉണ്ടായാൽ പലേ ദുർഘടങ്ങളും ഉണ്ടായിവരാം. ക്ഷണം പോയി കാൽക്കവീഴ്. “അമ്മാമന്റെ മുഷിച്ചിൽ ഉണ്ടായാൽ പലേ ദുർഘടങ്ങളും ഉണ്ടാവും എന്നു പറഞ്ഞതിനെ കേട്ടതിൽ ഇന്ദുലേഖയെക്കുറിച്ചാണ് ഒന്നാമതു മാധവൻ വിചാരിച്ചത്. ആ വിചാരം ഉണ്ടായ ക്ഷണം മാധവൻ്റെ മുഖത്തു പ്രത്യക്ഷമായ ഒരു വികാരഭേദം ഉണ്ടായി. എങ്കിലും അതു ക്ഷണേന അടക്കി. അറയിൽ അങ്ങോട്ടും ഇങ്ങോട്ടും നടന്നും കൊണ്ടും ലേശം മന്ദഹാസത്തോടെ മാധവൻ മറുപടി പറഞ്ഞു.
शाबाश! शाबाश! बहुत उत्तम! तुम किस धन से पढ़ाओगे? तुम्हें तो महीने में पचास रुपये ही मिलते हैं न? तुम कैसे पढ़ाओगे? मामा की अप्रसन्नता होने पर अनेक कठिनाइयाँ आ सकती हैं। तुरन्त जाकर उनके चरणों में गिर पड़ो। "मामा की अप्रसन्नता से अनेक कठिनाइयाँ आएँगी," यह सुनते ही माधवन ने सबसे पहले इन्दुलेखा के विषय में सोचा। यह विचार आते ही माधवन के मुख पर एक स्पष्ट भाव-परिवर्तन हुआ। किन्तु उसने उसे क्षण भर में ही दबा लिया। कक्ष में इधर-उधर टहलते हुए, हल्के से मन्दहास के साथ माधवन ने उत्तर दिया।
മാധവൻ / Madhavan
അദ്ദേഹത്തിനെ ഞാൻ എന്താണ് മുഷിപ്പിക്കുന്നത്? ന്യായമായ വാക്കു പറഞ്ഞാൽ അദ്ദേഹം എന്തിന് മുഷിയണം? അദ്ദേഹത്തിന്റെ ന്യായമല്ലാത്ത ആ മുഷിച്ചിലിന്മേൽ എനിക്കു ഭയമില്ല.
मैं उन्हें क्यों अप्रसन्न कर रहा हूँ? न्यायपूर्ण बात कहने पर वे क्यों अप्रसन्न होंगे? उनकी उस अन्यायपूर्ण अप्रसन्नता से मुझे कोई भय नहीं है।
ശങ്കരമേനവൻ / Sankara Menon
ഛീ! ഗുരുത്വക്കേട് പറയല്ലാ.
छिः! गुरुजनों का अनादर मत करो।
മാധവൻ / Madhavan
എന്തു ഗുരുത്വക്കേട്? എനിക്ക് ഈ വാക്കിന്റെ അർത്ഥം തന്നെഅറിഞ്ഞുകൂടാ.
कैसा अनादर? मैं तो इस शब्द का अर्थ ही नहीं जानता।
ശങ്കരമേനവൻ / Sankara Menon
അത് അറിയാത്തതാണ് വിഷമം. അപ്പു! നീ കുറെ ഇംക്ലീഷ് പഠിച്ചു സമർത്ഥനായി എന്നു വിചാരിച്ചു നമ്മളുടെ സമ്പ്രദായവും നടപ്പും കളയല്ലാ. കുട്ടൻ ഊണു കഴിഞ്ഞുവോ?
यही न जानना तो कठिनाई है। अप्पू! तुमने थोड़ी अंग्रेज़ी पढ़कर स्वयं को चतुर समझ लिया है, यह सोचकर हमारे रीति-रिवाज और परम्पराओं को मत त्यागो। बेटा, भोजन हो गया क्या?
മാധവൻ / Madhavan
ഇല്ല. എനിക്കു മനസ്സിനു വളരെ സുഖക്കേടു തോന്നി. അമ്മ പാൽക്കഞ്ഞിയും എടുത്തു വഴിയെ വന്നിരുന്നു. അപ്പോൾ പാർവ്വതിഅമ്മ പാൽക്കഞ്ഞി വെള്ളിക്കിണ്ണത്തിൽ കൈയിൽ എടുത്തതോടുകൂടി അകത്തേക്കു കടന്നു.
नहीं। मेरे मन को बहुत कष्ट हुआ। माँ दूध की काँजी लेकर पीछे-पीछे आ रही थीं। तभी पार्वती अम्मा चाँदी के कटोरे में दूध की काँजी लिए हुए भीतर प्रविष्ट हुईं।
ശങ്കരമേനവൻ / Sankara Menon
പാർവ്വതി! കേട്ടില്ലേ കുട്ടൻ പറഞ്ഞതെല്ലാം?
पार्वती! सुना तुमने, बेटे ने जो कुछ कहा?
പാർവ്വതി അമ്മ / Parvathi Amma
കേട്ടു! അശേഷം നന്നായില്ലാ.
सुना! तनिक भी अच्छा नहीं किया।
മാധവൻ / Madhavan
പാൽക്കഞ്ഞി ഇങ്ങട്ടു തരൂ. രണ്ടിറക്കു പാൽക്കഞ്ഞി നിന്നേടുത്തുനിന്നുതന്നെ കുടിച്ച് അമ്മയുടെ മുഖത്തു നോക്കി ചിറിച്ചുംകൊണ്ട്.
काँजी इधर दीजिये। खड़े-खड़े ही दो घूँट काँजी पीकर, माँ के मुख की ओर देखकर मुस्कुराते हुए।
മാധവൻ / Madhavan
അല്ലാ, അമ്മക്കും എന്നോട് വിരോധമായോ?
क्या, माँ भी मुझसे रुष्ट हो गयीं?
പാർവ്വതി അമ്മ / Parvathi Amma
പിന്നെയൊ; അതിനെന്താണു സംശയം? ജേഷ്ഠനും അമ്മാമനും ഹിതമല്ലാത്തത് എനിക്കും ഹിതമല്ല. ആട്ടേ; ഈ കഞ്ഞി കൂടിക്കൂ. എന്നിട്ടു സംസാരിക്കാം. നേരം ഉച്ചയായി കുടുമ എന്തിനാണ് എപ്പോഴും ഇങ്ങനെ തൂക്കി ഇടുന്നത്; ഇങ്ങട്ടു വരൂ; ഞാൻ കെട്ടിത്തരാം. കുടുമ പകുതി ആയിരിക്കുന്നു.
और नहीं तो क्या; इसमें क्या सन्देह है? जो ज्येष्ठ और मामा को प्रिय नहीं, वह मुझे भी प्रिय नहीं। अच्छा; यह काँजी पी लो। फिर बात करते हैं। दोपहर हो गयी है। अपनी शिखा को हर समय ऐसे लटकाये क्यों रखते हो; इधर आओ; मैं बाँध देती हूँ। शिखा आधी खुल गयी है।
മാധവൻ / Madhavan
അമ്മേ ശിന്നനെ ഇംഗ്ലീഷ് പഠിപ്പിക്കേണ്ടത് ആവശ്യമോ അല്ലയോ? നിങ്ങൾപറയിൻ.
माँ, शिण्णन को अंग्रेज़ी पढ़ाना आवश्यक है या नहीं? आप ही कहिये।
പാർവ്വതി അമ്മ / Parvathi Amma
അതു നിൻ്റെ വലിയമ്മാമൻ നിശ്ചയിക്കേണ്ടതല്ലേ കുട്ടാ. എനിക്ക് എന്തറിയാം. വലിയമ്മാമനല്ലേ നിന്നെ പഠിപ്പിച്ചത്? അദ്ദേഹം തന്നെ അവനെയും പഠിപ്പിക്കുമായിരിക്കും.
बेटा, यह तो तुम्हारे बड़े मामा को निश्चय करना है न। मैं क्या जानूँ। तुम्हें बड़े मामा ने ही तो पढ़ाया है? वे ही उसे भी पढ़ा देंगे।
മാധവൻ / Madhavan
വലിയമ്മാമൻ പഠിപ്പിക്കാതിരുന്നാലോ?
और यदि बड़े मामा न पढ़ाएँ तो?
പാർവ്വതി അമ്മ / Parvathi Amma
പഠിക്കേണ്ട.
तो पढ़ने की आवश्यकता नहीं।
മാധവൻ / Madhavan
അതിനു ഞാൻ സമ്മതിക്കുകയില്ലാ.
इसकी मैं अनुमति नहीं दूँगा।
പാർവ്വതി അമ്മ / Parvathi Amma
കിണ്ണം ഇങ്ങോട്ടു തന്നേക്കൂ; ഞാൻ പോകുന്നു. ഉണ്ണാൻ വേഗം വരണേ.
कटोरा इधर दो; मैं जाती हूँ। भोजन के लिए शीघ्र आना।

End of Chapter 1

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